अगर महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी इस एक सुझाव को अपना लेते तो न 1947 का बंटवारा होता। न खून खराबा होता और न ही लाशें बिखरतीं। न भारत- पाकिस्तान बनते और न ही दुश्मनी का ऐसा माहौल होता।
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